बच्चे मन के सच्चे होते हैं ये बात पूरी तरह से सच ही दिखती है वो बात अलग है की बच्चों की उम्र सीमा भले ही कुछ कम हो गयी हो। आज के बदलते परिवेश में जहाँ सूचना का आदान प्रदान आसान हो गया है, जानकारी आसानी से उपलब्ध हो गयी है तो जाहिर है जो बातें पहले बच्चों को देर से पता चलती थी वो अब जल्दी होने लगी हैं जिससे हम कह सकते हैं की बच्चे जल्दी बड़े होने लगे हैं पर फिर भी एक उम्र तक वो भोला पन बरक़रार है ओर रहेगा।
वो आसमान छूते सपने, वो कल्पनाओं की उड़ान, वो खिलखिलाता बचपन ओर भोली मुस्कान कहाँ चली जाती है जब बच्चे बड़े होने लगते हैं। कौन है जो सबसे पहले इन सबको ख़तम कर देता है, कौन है जो ये बताता है कि सब सच में सपने हैं जो पूरे नहीं हो सकते, जमीनी सच्चाई कुछ ओर है। कौन है वो?
मुझे लगता है वो कोई ओर नहीं माता पिता हैं जो ये सब करते हैं इसलिए नहीं की पैसों की कमी है क्योंकि पैसे से वो सपने पूरे नहीं किये जा सकते बल्कि इसलिए की उन्हें खुद ये सब सपने सा लगता है इसलिए वो जमीनी सच्चाई की बात करते हैं। उन्हें ये डर होता है की कहीं इन सपनो के चक्कर में दो वक़्त की रोटी भी उनके बच्चों को नसीब न हुई तो क्या होगा।
क्या हो जो माता पिता भी बच्चों के साथ बच्चा बन जाएँ, क्या हो जो वो भी सपनो के आसमान में उड़ जाये, क्या हो जो वो भी आसमान से सितारें तोड़ लायें।।।।। क्या हो?
Monday, February 25, 2013
Thursday, December 27, 2012
कोई भी माँ बाप अपने बच्चों को लुच्चा, लफंगा, चोर, उचक्का बनाना नहीं चाहते
संस्कार और मूल्य बहुत अमूल्य होते हैं, माता पिता पर बहुत कुछ निर्भर करता है। आज के समय में माँ बाप बहुत हद तक बच्चों को बिगाड़ रहे हैं, लाढ प्यार ओर दिखावे के चक्कर में बच्चों को पहले तो सपोर्ट किया जाता है फिर धीरे धीरे बात हाथ से निकल जाती है।
बैसे कोई भी माँ बाप अपने बच्चों को लुच्चा, लफंगा, चोर, उचक्का बनाना नहीं चाहते पर बन रहे हैं, कोई नहीं चाहता की उनका लड़का सड़क पर खड़े होकर लड़कियां छेड़े, सिगरेट दारु में डूबा रहे पर कर रहे हैं। कोई माँ बाप नहीं चाहते कि उनकी बेटी घर में बगैर बताये लडको के साथ पार्कों में घूमे, मूवी देखे, डिस्को जाये, सिगरेट पियें पर कर रही हैं।
माँ बाप 24 घंटे बच्चों पर नज़र नहीं रख सकते और न रखनी चाहिए पर बच्चे को इस काबिल बनाना कि वो खुद तय करे कि क्या सही है और क्या गलत ये बहुत ही जरूरी है। ये सब एक दिन में या एक महीने में नहीं किया जा सकता ये तो एक सतत प्रक्रिया है। छोटे बच्चों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, बस एक बार सही दिशा तय हो जाये फिर धीरे धीरे काम आसान हो जाता है।
Subscribe to:
Posts (Atom)
