Monday, February 25, 2013

जब बच्चे बड़े होने लगते हैं

बच्चे मन के सच्चे होते हैं ये बात पूरी तरह से सच ही दिखती है वो बात अलग है की बच्चों की उम्र सीमा भले ही कुछ कम हो गयी हो। आज के बदलते परिवेश में जहाँ सूचना का आदान प्रदान आसान हो गया है, जानकारी आसानी से उपलब्ध हो गयी है तो जाहिर है जो बातें पहले बच्चों को देर से पता चलती थी वो अब जल्दी होने लगी हैं जिससे हम कह सकते हैं की बच्चे जल्दी बड़े होने लगे हैं पर फिर भी एक उम्र तक वो भोला पन बरक़रार है ओर रहेगा।

वो आसमान छूते सपने, वो कल्पनाओं की उड़ान, वो खिलखिलाता बचपन ओर भोली मुस्कान कहाँ चली जाती है जब बच्चे बड़े होने लगते हैं। कौन है जो सबसे पहले इन सबको ख़तम कर देता है, कौन है जो ये बताता है कि सब सच में सपने हैं जो पूरे नहीं हो सकते, जमीनी सच्चाई कुछ ओर है। कौन है वो?

मुझे लगता है वो कोई ओर नहीं माता पिता हैं जो ये सब करते हैं इसलिए नहीं की पैसों की कमी है क्योंकि पैसे से वो सपने पूरे नहीं किये जा सकते बल्कि इसलिए की उन्हें खुद ये सब सपने सा लगता है इसलिए वो जमीनी सच्चाई की बात करते हैं। उन्हें ये डर होता है की कहीं इन सपनो के चक्कर में दो वक़्त की रोटी भी उनके बच्चों को नसीब न हुई तो क्या होगा।

क्या हो जो माता पिता भी बच्चों के साथ बच्चा बन जाएँ, क्या हो जो वो भी सपनो के आसमान में उड़ जाये, क्या हो जो वो भी आसमान से सितारें तोड़ लायें।।।।। क्या हो?